Skip to main content

Posts

Featured

गीता बिंदु 1: अध्याय 1

आगे आने वाले अंको में मेरी ये कोशिश है कि श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान मैं अपने भाइयों और बहनों , माताओं और पिताओं के साथ बाट सकूँ।  हिंदी इन अंकों में प्राथमिक रूप से प्रयोग की जायेगी।



जहाँ मोह होता है, वहां मनुष्य का विवेक दब जाता है।  विवेक दबने से मोह की प्रबलता हो जाती है।  मोह के प्रबल होने से अपने कर्त्तव्य का स्पष्ट भान नहीं होता।  मनुष्य संयोग से जितना सुख लेता है, उसको वियोग का उतना ही दुःख भोगना पड़ता है।  मनुष्य की दृष्टि जब तक दूसरों के दोष की तरफ रहती है , तब तक उसको अपना दोष नहीं दीखता , उलटे अभिमान होता है कि इनमें तो ये दोष है, पर हमारे में यह दोष नहीं है।  ऐसी अवस्था में वह यह सोच ही नहीं सकता कि इनमें अगर कोई दोष है तो हमारे में भी कोई दूसरा दोष हो सकता है।  दूसरा दोष यदि न भी हो , तो भी दूसरों का दोष देखना - यह दोष तो है ही।  दूसरों का दोष देखना एवं अपने में अच्छाई का अभिमान करना - ये दोनों दोष साथ में ही रहते हैं। मनुष्य सुख भोग आदि के लोभ में आकर अपने विवेक का निरादर कर देते हैं और राग-द्वेष के वशीभूत हो जाते हैं, जिनसे उनके आचरण शास्त्र और कुलमर्यादा के विरुद्ध होने …

Latest Posts

Escaping The Dietary Pleasure Trap - Alan Goldhamer DC - FULL TALK

Biggest 5 lessons from life so far I have learnt

What You Eat Matters - 2018 Documentary H.O.P.E.

History of Privatization of Health in India: Adapted from "Do We Care"

NCDs and poverty

Disaggregated Data : Urgent Need for Public Health in India

The bitter, untold and detrimental truth about the Agribusiness

Understanding Reason behind World's Hunger : Part Two

Understanding Reason behind World's Hunger : Part One

Reflections